Saturday, July 9, 2011
क्या वो बागवां गुनहगार नहीं है?
Saturday, July 2, 2011
""सधे कदमों से चल रहे है अन्ना''
कभी-कभी बहुत तेज चलना और लक्ष्य को सामने खुद आता देखकर अति आत्मविश्वास के साथ छलांग लगाना बहुत खतरनाक होता है। बाबा रामदेव का प्रसंग अन्ना हजारे के लिए सबक बन गया है- और वे इसको बहुत गंभीरता के साथ लेकर उस पर सही अमल करते हुए दिख रहे हैं।
अन्ना और बाबा रामदेव का लक्ष्य एक ही है-पर शैली काफी अलग है, इन दोनों का व्यक्तित्व और जनता तक पहुंचने का तरीका भी अलग है। पर दोनों में एक फर्क है... बाबा को नया-नया प्रसिद्धी का स्वाद मिला है और सियासी गोटियों के चक्रव्यूह में घुसकर निकलने की जानकारी नहीं है। बाबा रामदेव चूंकि योग सिखाते हैं-इसलिए बोलने की आदत अधिक है अधिक बोलना कई बार गले की घंटी बन जाता है- नाप-तौल कर बोलने वाले की बात का वजन होता है क्योंकि लोग उसके व्यक्तव्य को गंभीरता से लेते है-इस प्रकार यहां भी अन्ना, बाबा रामदेव से अलग नजर आते हैं। एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल है टीम का-यहां अन्ना बाबा रामदेव से खासे आगे हैं क्योंकि अन्ना के पास जो तिकड़ी भूषण,बेदी, केजरीवाल की है वो सरकार को बोल्ड करने का हुनर रखती है।
अन्ना के कदम हर राजनीतिक दल के दरवाजे तक जा रहे है-और वे अपना पक्ष समझाकर उनकी मंशा को सीधे जान रहे है- अब अगर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए सशक्त लोकपाल का विरोध किस अंदाज में कोई करता है-यह राज अन्ना की टीम का जानना आगे की रणनीति में इनके लिए अस्त्र के रूप में काम करेगा।
एक खास बात यह है कि भीड़ में बोलना व अकेले में बोलने में फर्क होता है। राजनैतिक दलों के लिए अकेले में अन्ना की टीम के सामने मजबूत लोकपाल का विरोध करना मुश्किल बात होगी।
लोहा ही लोहे को काटता है-बिल्कुल इसी तर्ज पर चल रहे है ""अन्ना'' और सियासत खुद अपने ही बनाये चक्रव्यूह में फंस जाये तो कोई आश्चर्य नहीं। सियासत गला फाड़ कर कह रही है कि संसद सर्वोच्च है क्योंकि यहां जनता के चुने प्रतिनिधि फैसला लेते है... ये लोग जड़ को भूलकर पत्तों को सर्वोच्च बतला रहे है- जड़ तो जनता है-इस लिहाज से सर्वोच्च जनता है....और जनता का विश्वास सियासत से जब उठ गया है तब वो सशक्त लोकपाल चाहती है। अन्ना और उनकी टीम को इस देश की जनता का समर्थन मिल रहा है तब भी सियासत लोकपाल के मुद्दे पर सकपका रही है।
अंधेरी रात के बाद भोर आती है... प्रकृति के इस नियम को कौन रोक सकता है? भारत की जनता सियासत में उजास चाहती है... सियासत को अपना कर्म, चाल-चलन बदलना होगा- अन्यथा वक्त आने पर जनता बदल देगी।
Saturday, June 25, 2011
लोकपाल की जगह पोलपाल!
लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने में समाज की तरफ से अन्ना हजारें व उनके सहयोगियों को आम जनता के अधिकारों के लिए सरकार से जिस तरह जुझना पड़ रहा है- उससे यह संदेश आ रहा है कि सरकार लोकपाल के नाम पर पोलपाल का कुछ ऐसा विधेयक लाना चाह रहीं है जहां जनता के पास अधिकारों के रुप में खाली पिटारा हो-और सरकार व राजशाही के खिलाफ बुलन्द आवाज करने वालों की इच्छा रखने वालों के खिलाफ कुछ ऐसे कायदे-कानून लाये जाये जिससे कोई आवाज उठाने की हिम्मत ही नहीं करें।
अगर किसी अधिकारी के खिलाफ अगर कोई आम जन आरोप लगाये तो उस अधिकारी को मिलेगा सरकारी वकील... और आरोप लगाने वाला आम जन अपने खर्चे पर लड़ेगा। अगर वो अधिकारी जिस पर आरोप लगा है वो दोषी पाया जाता है तो उसको मिलेगी मामूली सजा-लेकिन अगर वो निर्दोष साबित हो तो आरोप लगाने वाले को कड़ी सजा! सरकार की नजर में लोकपाल का अर्थ अगर यही है तो फिर यह लोकपाल नहीं पोलपाल होगा- जहां खुली पोलों पर कारवाई खत्म नहीं होगी- लेकिन पोल खोलने वाला हमेशा चक्रव्यूह में रहेगा।
सरकार ने जनता के अधिकारों व देश की भ्रष्ट्र-निरंकुश व्यवस्था पर अपनी मनःस्थिती साफ कर दी है- लेकिन राजनीति पुरी संवेदनहीन हो गई है - अभी यह कहना शायद उचित न हो।
संसद में बकोल प्रतिनिधि विभिन्न सिद्धांतो- विचारधाराओं के राजनैतिक दल है- अब देखना यह है कि ये जनता, जनतंत्र के समर्थन में अपना मुंह कितना खोलते है?
आने वाले लोकसभा चुनावों में लोकपाल अहम मुद्दा बनेगा और जनता राजनीति की उस डगर पर मुहर लगायेगी जो जनता के अधिकारों के संरक्षण पर आज मुहर लगायेगा अर्थात जनता के लिये संसद में खुलकर बोलेगा। क्योंकि जनता वास्तविक रुप से लोकपाल ही चाहती है।
Tuesday, June 14, 2011
हम सब दोषी हैं....
Friday, June 10, 2011
सत्याग्रह
भष्टाचार
व
भष्टाचारियों
की
इस व्यवस्था का
सत्याग्रह से
समाधान...
नहीं हो सकता
असुर शक्ति का
नीति से परिहार
नहीं हो सकता...
और जब तक
हम
उनके सामने
नीति विचार
की घंटी
गांधी की
अहिंसा की लाठी
से
दबायेंगे...
तब तक
वो
देश का
निवाला और
निगल जायेंगे...
इसलिए
अब हमें
गांधी को छोड़कर
भगत,
सुभाष,
तात्या,
लक्ष्मीबाई
की
राहों पर
आना होगा
और
प्रहार दर प्रहार
कर
इनका
संहार करना होगा।
भ्रष्ट व्यवस्था
बनाने
वाले
इन व्यवस्थापकों
को
उनकी
भाषा में
समझाना होगा-
उन्होंने
लाठियां चलाई
तो हमको
लट्ठ
चलाना होगा..
तब इस समस्या का
समाधान होगा...
अन्यथा
अमर बेल
की
तरह
और
प्रसार होगा।
-संजय सनम
Friday, June 3, 2011
प्रियंका की रहस्यमय मौत का मामला
वाह रे! तेरापंथ समाज
समाज की एक बेटी की ससुराल में जहर पिलाकर व फिर उसको आत्महत्या का मामला बनाने की कोशिश करने का जघन्य काम किया जाता है तब भी समाज के कुछ सक्रिय और मौजीज लोगों के द्वारा पीड़ित पक्ष (लड़की) के पीहर पक्ष को इस मामले को तूल न देकर आपसी समझौता करने का दबाव बनाते है।
वाह रे समाज! साथ तो पीड़ित पक्ष का देना चाहिए और आरोपी पक्ष के खिलाफ आवाज ऐसी बुलन्द करनी चाहिए कि फिर कोई बहु को मारने की ती दूर बल्कि उसको प्रताड़ित करने की भी कोशिश न करें... पर समाज के कर्णधार जब आरोपियों को संरक्षण देने की कोशिश करते हैं तो इसका अर्थ उनके घरों में भी बहुओं की स्थिति पर सवालिया निशान लग सकता है। जो किसी की बेटी के हत्यारों के लिए पीड़ित पक्ष पर दवाब बना कर समझौता कराने की कोशिश कर सकते हैं इससे साफ है कि उनके मन में संवेदन की अनुभूति नहीं है अर्थात वे आरोपियों का साथ देने वालों की कतार में खड़े है। कोई आश्चर्य नहीं कि कभी उनके घर से भी बहु को मारने व मामले को रफा-दफा करने की घटना घट जायें।
ऐसी बेजा हरकत करने वालों के कुछ नाम मेरे सामने आये है.... मैं उनको अभी प्रकाशित नहीं कर रहा हूं पर उनको आगाह अवश्य कर रहा हूं कि अपनी इन ओछी हरकतों से वे लोग बाज आये अन्यथा समाज के सामने ऐसे काले चेहरों को लाने में मैं संकोच नहीं करुंगा।
मुझे दुःख है कि समाज उन लोगों का वहिष्कार व दबाव नहीं डालता जो बहु पर अत्याचार, प्रताड़ना व दहेज की मांग करके या तो उसे मरने के लिए मजबूर कर देते है या फिर मार कर उसको आत्महत्या का मामला बनाने की कोशिश से भी नहीं चुकते-फिर उसके लिये स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपने पक्ष में लेने के लिए दौलत को पानी की तरह क्यूं न बहाना पड़े।
अगर समाज में दम हो तो वो पीड़ित पक्ष के साथ खड़ा होकर अन्यायी को वो सजा दे सकता है-जिससे समाज की गरिमा और उसके होने का अर्थ नजर आये। यह घटना बीदासर की बेटी (प्रियंका) सुपुत्री थानमल दूगड़ व छापर के छाजेड़ परिवार विमल सिंह छाजेड़,(जैन) परिवार में दुर्गाचक हल्दिया मिदनापुर पूर्व में घटी है। घटना को खबर के प्रारुप में प्रकाशित किया गया है-इसकी संपूर्ण जानकारी पाठक खबर को पढ़ कर लेवे।
पाठक वर्ग से अनुरोध है कि ऐसी घटनाओं में अन्याय के पक्ष में खड़े दिखने वाले लोगों की इज्जत उतारने में कोताही न बरते। जो लोग प्रियंका की हत्या के इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश में लगे है वो यह जान ले कि पुलिस प्रशासन को दौलत पर चाहे खरीदा जा सकता हो व आरोपियों के पक्ष में खड़े होकर अपना दोगलापन दिखलाने की कीमत पर उनको भी दौलत का प्रसाद चाहे मिल सकता हो पर वो आत्मा उनको कभी माफ नहीं कर सकती जिसकी जिन्दगी को असमय हत्यारों के द्वारा लील लिया गया हो। हो सकता है कानूनी कार्रवाई को भी अंजाम तक पहुंचाने में समय लगे पर उस आत्मा को अपनी मौत का बदला लेने में समय नहीं लगेगा। ऐसे मामले कई सुने गये है जिनमें मृतात्मा ने अपना प्रतिशोध खुद लिया है। मैं प्रियंका की आत्मा की शांति के लिए भगवान से प्रार्थना करता हूं-पता नहीं क्यों? मुझे लगता है-जो काम वक्त पर प्रशासन व समाज नहीं कर सका वो काम प्रियंका खुद करेगी-इसलिए प्रियंका को मारने व उसके इस मामले को रफा-दफा करने की कुचेष्टा करने वालों के लिए खतरे की घंटी बजती दिख रही है।
जिन लोगों ने अपराध किया है व जो लोग किसी न किसी रूप में अपराधियों के सहयोगी बने है-वक्त की अदालत उनको उनके कर्मों की सजा जरूर देगी पर जिस आंगन की बेटी ससुराल पक्ष के अत्याचारों से पीड़ित होकर मौत के आगोश में समा गई है उस पीड़ित परिवार के लिए समाज की भूमिका क्या रही है? क्या इसे ही समाज कहते है?क्या रिश्ते-नाते और अपने स्वार्थ इतने हावी हो गये है कि पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने की बजाय उसे समझौता करने के लिए दबाव दिया जाये।
समाज के प्रबुद्ध वर्ग से मेरा निवेदन है कि पीड़ित पक्ष से सम्पर्क कर उन लोगों को चिन्हित करे जो समझौते रूपी दलाली की कोशिश कर रहे थे और इन लोगों को समाज के खुले मंच पर खड़ा करके कड़ी फटकार लगाई जाये ताकि ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके। मैं अपने इस संपादकीय के माध्यम से अपने कलम धर्म के साथ सामाजिक दायित्व का पालन कर रहा हूं-अगर समाज रूपी संगठन में कहीं दायित्व बोध की भावना बची है तो वो अपनी उपस्थिति दर्शावे अन्यथा समाज रूपी यह संस्था पाकेटी संस्था का ही रुपक लगेगी-जिसको स्वीकार नहीं किया जायेगा।
मैं आरोपी पक्ष के उन रिश्तेदारों को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने पीड़ित पक्ष की बात सुनने के बाद आरोपी पक्ष को अपना समर्थन न देने की बात कही और इस घटना के लिए दुःख प्रगट किया।
मानवीयता, रिश्तों-नातों से कहीं अधिक ऊपर होती है। पर अफसोस आजकल समाज रूपी संगठन अपने निहित स्वार्थ व दौलत के हाथ चलता है-इसलिए किसी का कत्ल हो जाता है और समाज "उफ' तक नहीं करता।
