Saturday, March 5, 2011

गलती या मजबूरी

कल तक
प्रधानमंत्री जी
गलतियों
को
गठबंधन की
मजबूरी
बतला रहे थे...
पर
अब
थामस की नियुक्ति
को
अपनी
गलती
बता रहे है-
या
दस जनपथ
के
रिमोट से
रोबोट की तरह
सर हिला रहे हैं।

Friday, February 25, 2011

ये कैसी मजबूरी है?


राजनीति में एक ही घटना परिस्थिति के आधार पर स्वीकार व नकार दी जाती है - अब ममता जी के रेल बजट को ही लीजिए- अपने रेल बजट में जब उन्होंने बंगाल को मालामाल कर दिया तब वाम मोर्चे ने उसको चुनावी बजट का नाम दे दिया- अर्थात बंगाल को जो रेल बजट ने दिया वो भी उनको स्वीकार्य नहीं था... चूंकि बंगाल में विधानसभा चुनाव आने वाले दिनों में होने वाले हैं - इसलिए वाममोर्चे को ममता जी की ये सौगाते जो बंगाल को दी गई है वे नहीं पच रही है और समालोचना की बजाय इकतरफा आलोचना वे कर रहे है। ममता जी ने बंगाल को जिस तरह से फोकस किया है उन्होंने भी विधानसभा चुनाव को नजर में रख कर किया है... इसलिए चुनावी बजट से हम इंकार नहीं कर सकते- पर राजनीति में इतनी संवेदनशीलता तो होनी चाहिए कि अपने क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दे-चाहे वो चुनाव के मद्देनजर हो या फिर किसी दबाव में हो या अपनी नैतिक जिम्मेवारी समझ कर हो। सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना करना अपनी ताकत को कमजोर जताना होता है- इसलिए जो बंगाल को ममता दीदी ने अपने रेल खजाने से दिया- उसके लिए उनको बधाई दी जानी चाहिए-अगर सवाल पूछना हो तो उन परियोजनाओं के लिए पूछा जाना चाहिए जो पिछले रेल बजट की घोषणा के बाद भी अधरझूल में लटकी हुई है- सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि ममता जी ने अगर राइटर्स को फतह कर लिया और मुख्यमंत्री बन गई तो उनको रेल को छोड़ना पड़ेगा..... तब इन घोषणाओं का क्या होगा?
सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए की क्या रेलवे की जाजम इतनी बड़ी है जितनी घोषणाओं ने पैर पसारे है सवालों के संदर्भ से आलोचना होनी चाहिए पर एक स्वर से सिर्फ आलोचना उचित नहीं लगती।
चाहे राजनीति का तकाजा कितना ही बड़ा क्यों न हो पर उचित अनुचित का ख्याल रखना ही चाहिए। ममता जी ने रेलवे की जाजम पर बैठकर राइटर्स का कार्ड मजबूती से खेला है- इसको आप सिर्फ आलोचना से नहीं रोक सकते, आपको भी कुछ करके दिखाना होगा यह बात अलग है कि जब आपके पास समय था तब आपने कुछ दिखलाया नहीं और अब आप कुछ दिखलाना चाह रहे हैं तब आपके पास समय नहीं है। यह कहावत याद आती है जब चिड़िया चुग जाये खेत तब पछताये क्या होत?
ममता रूपी चिड़िया राजनीति का यह खेत बंगाल के संदर्भ में चुग गयी दिखती है। ममता जी ने अपने रेल बजट में राजस्थान प्रवासियों की सुविधा का भी अच्छा ख्याल रखा है। हां, बिहार व उत्तर प्रदेश से शिकायत के स्वर उठे हैं...।
सबकी झोली को एक साथ भरा भी नहीं जा सकता फिर भी ममता ने अपनी ममता दिखाई है।

Friday, January 28, 2011

सरकार गिर रही है!

शेयर बाजार का सेन्सेक्स जिस तरह से धड़ाम-धड़ाम करके गिर रहा है उसे देखकर यह अनुमान स्वाभाविक है कि केंद्र सरकार के अंदर कहीं न कहीं भारी उथल-पुथल मची हुई है। घोटालों के चक्रव्यूह में फंसी मनमोहन सरकार की स्थिति जनता के मानस पटल पर डांवा डोल जैसी हो गई है।
हमारे यहां आम धारणा है कि शेयर बाजार का सेन्सेक्स जहां जीडीपी ग्रोथ, मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर चलता हो पर सरकार का सेन्सेक्स शेयर बाजार की स्वस्थता या अस्वस्थता पर काफी हद तक टिका होता है। जब सेन्सेक्स इक्कीस हजारी था तब मनमोहन सरकार बहुत मजबूत, प्रगतिशील स्वस्थ दिख रही थी। पर अब वहीं सेन्सेक्स जब अठारह हजार से भी नीचे आ गया है तब ऐसा लगने लगा जैसे कि मनमोहन सरकार ही नीचे आ गई है। आम निवेशकों को पूछिये तो बाजार में आई मंदी की मार को वो मनमोहन की घोटाला सरकार को दोषी मानते है और यह कहते हैं कि देश के हित में इस सरकार को खुद गिर जाना चाहिए।
निवेशकों की बद्दुआ का असर क्या गुल खिलायेगा? कहना मुश्किल है पर इतना तय लगता है कि यह सरकार स्वस्थ नहीं लग रही है। घोटालों व काले धन के वायरस से संक्रमति व महंगाई से ग्रसित कहीं भीतर ही भीतर गिर जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

Friday, January 21, 2011

वो भूकम्प था या बर्फवारी थी





घोटाले क्रेस में सेन्सेक्स धराशायी

-संजय सनम

चाहे भूकम्प के झटके कहिये, हवा के फटके कहिये या फिर घोटाले के एक विमान की स्टॉक एक्सचेन्ज बिल्डिंग से टकराने-सी टक्कर कहिये या फिर शीत के मौसम में सेन्सेक्स पर भारी बर्फवारी की खबर कहिये... शेयर बाजार सेन्सेक्स के हालातों पर आप इनमें से कोई भी जुमला कह सकते हैं- करतूत घोटालों की और मार शेयर बाजार सेन्सेक्स सह रहा है। इक्कीस हजारी सेन्सेक्स बिल्कुल इक्कीस वर्षीय किसी हसीना की तरह अपनी बलखाती चाल से करोड़ों दिलों को इतना सकून दे रहा था कि लोग पीठ पीछे महंगाई के चाबुक की चोट का दर्द भी इसे देख कर भूल से गये थे- पर जब इस हसीना पर घोटाला रूपी दुष्कर्म का प्रभाव पड़ा और वो ऐसे चलने लगी जैसे अचानक ही उसके पांव भारी हो गये तब करोड़ों निवेशकों का सकू न खत्म होने लगा...और महंगाई के चाबुक की चोट के जख्म हरे होने लगे। ये जख्म लगातार हरे हुये जा रहे हैं और निवेशक अपने आपको एक बार फिर इसलिए कोस रहे हैं कि उन्होंने सरकार के ग्राफ पर विश्वास क्यों किया? जी.डी.पी. ग्रोथ के आंकड़ों के छलावे में क्यों आये?

आखिर यहां तो घोटाले की ग्रोथ विश्वसनीय होती है-क्योंकि जी.डी.पी. ग्रोथ से अधिक तो सरकार में काम करने वालों की क्रियाविधि इसमें रहती है...और इस ग्रोथ के आंकड़े जब आते हैं तो सेन्सेक्स का सेन्स ऑफ ह्युमर भी खत्म हो जाता है। काश सेन्सेक्स घोटालों के ग्राफ से तेजी पकड़ता तो अब तक इन्डेक्स इक्कीस हजारी नहीं इक्कीस करोड़ी हो जाता पर यह तो मुद्रास्फीति के आंकड़े, जी.डी.पी. वृद्धि दर पर चलता है इसलिये थोड़ा सा तेज चल कर फिर ऐसे गिरता है-जैसे कई सालों से कुछ खाया-पिया ही नहीं हो।

चूंकि इस देश से घोटाले नहीं मिट सकते- क्योंकि अब यह घोटालेबाजों का ही हो गया है-इसलिये घोटाले मिटाने का सुझाव नहीं दिया जा सकता पर एक सुझाव वित्तमंत्री जी को दिया जा सकता है- कि शेयर बाजार का सूचकांक घोटालों की रकमों के ग्राफ से जोड़ दे- फिर इस बाजार में कभी मंदी नहीं आयेगी और निवेशकों की जेबों में तंगी नहीं आयेगी।

कृपया जी.डी.पी. ग्रोथ आर्थिक विकास पर नहीं घोटालों के विकास से रेखांकित करें...फिर चाहे टेक्स जितना चाहे लगा लें पर घोटालों की पुरी खेप का रुपया इन्डेक्स ग्रोथ के नाम करवा दें।

एक बात और- घोटालों का काला धन भारतीय बैंकों में रखने का प्रावधान किया जाये-जिससे भारतीय बैंक ों में धन की तरलता रहेगी-तथा यह काला धन ७ वर्षों के लाकिंग पीरियड में किया जाये- इसका ब्याज बैंकों को नहीं देना होगा तथा ७ वर्षों के लाकिंग पीरियड में बैंक इसका अन्य उपयोग कर ब्याज कमा सकेगी- इस तरह का प्रावधान करने से बैंक इन्डेक्स में जबरदस्त तेजी होगी जो कि शेयर बाजार के सेन्सेक्स के लिये जरूरी होगी। वित्तमंत्री जी को काले धन का खुलासा करने वालों को पूर्ण रूप से कर में छूट देनी होगी- वो काला धन ७ वर्ष के लिये बैंकों में लाकिंग पीरियड में रखने का प्रावधान करना होगा तथा बैंकों की उस धन द्वारा ब्याज की आय पर सरकार टेक्स प्रावधान कर सकती है।

सरकार को चाहिये कि या तो वो घोटाले खत्म करे पर यह नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा लगता है कि बिना घोटाले के सरकार ही नहीं चल सकती- ये घोटाले शायद सरकार के निजी आर्थिक जगत के लिये टॉनिक का काम करते हैं। इसलिये सरकार को घोटाले के धन को कम से कम विदेशी बैंंकों में जाने से रोकना चाहिए- यह तभी हो सकता है जब काले धन पर सरकार उदारता पूर्वक काले धन के लिये विशेष आयकर धारा का निर्माण कर घोटालेबाजों को आयकर में राहत देकर भारतीय बैंकों में काले धन को निवेश करने के लिये प्रोत्साहित करें।

अगर ऐसा हुआ तो शेयर बाजार सेन्सेक्स आसमानी ऊंचाई पर होगा- करोड़ों निवेशकों का मन भरा होगा- तब फिर महंगाई भी कुछ नहीं बिगाड़ सके गी-और इनका ध्यान बंटा नहीं सकेगी। जहांं तक सवाल गरीब वर्ग का है...वो तो राजनीति के संरक्षण के लिये जान-बूझकर उसे गरीब ही रखा गया है-आप गरीबी राजनैतिक मजबूरी की वजह से मिटा नहीं सकते... ये महंगाई गरीबों को ही मिटा देगी और सरकार के ऊपर सीधे रूप से इल्जाम भी नहीं आयेगा- तब शहींदों के सपनों का भारत गरीबी नहीं गरीब मुक्त कहा जायेगा।

इसलिये वित्तमंत्री जी अपने आगामी बजट में मुद्रस्फीति, जी.डी.पी. ग्रोथ ये सब रहस्यबोधक शब्द पूर्ण रूप से हटा दीजिए-अपना बजट घोटालों की ग्रोथ से बना दीजिए-तब आपके बजट को ढोने वाली अटेची भी धन्य होगी- क्योंकि वो वजनदार होगी... कंगाल नहीं होगी।

तुम चुप क्यों हो?

तुम चुप क्यों हो?बढ़ती महंगाई और इस पर एक के बाद एक घोटाले...और सरकार का मुखिया चुप... तब पहला आरोप तो मुुखिया पर ही जाता है कि कहीं घोटाले में उनकी हिस्सेदारी हो...पर सरकार के मुखिया कि छवि शालीन,विनम्र, ईमानदार की हो तब वो आरोप फिर वापिस घुम कर उन बेनकाब चेहरे पर ही आ जाता है- जिनके खिलाफ सबूत मिले हो व जांच चल रही हो। इतना कुछ होने के बाद भी जब मुखिया मौन साधे रहता है तब वो आरोप एक बार फिर मुखिया पर आता है- औैर इस बार वहां से घुमता नहीं बल्कि मुखिया के इर्द-गिर्द यह कहता हुआ मंडराता है कि ""तुम भी ईमानदार नहीं हो'' हो सकता है तुम्हारी इन घोटालेबाजों से मिली-भगत नहीं हो, हो सकता है घोटाले का अंश तुम्हारी जेब में तुमने नहीं लिया हो-पर तुम मुखिया हो और तुम्हारी नाक के नीचे से यह काली करतूत हुई है और कुछ लोगों ने तुमको समय पर आगाह भी किया पर तुमने चुप्पी साधे रखी-अर्थात घोटालेबाजों को पुरा वक्त दिया और घोटाला सामने आने के बाद भी सबूत को साफ करने तक का वक्त दिया... तुम्हारी इस चुप्पी पर न्यायपालिका तक को बोलना पड़ा...आखिर क्यों?इसलिये लगता है कि तुम्हारी ईमानदारी अपनी जवाबदेही के प्रति बिल्कुल नहीं है- एक मुखिया के फर्ज के प्रति तुम बिल्कुल ईमानदार नहीं हो- ऐसा भी लगता है कि तुम दिखावे के मुखिया हो, तुम्हारी मुखिया कोई और है...जो अपने रिमोट से तुमको चला रहा है...बताओ तुम चुप क्यों हो?जनता कि अदालत में तुम्हारी यह चुप्पी एक आरोपी के रूप में तुमको कटघरे में खड़ा करने के लिये काफी है।हजारों करोड़ों का घोटाला करने वाले उन आरोपियों से भी संगीन तुम्हारा अपराध है... तुमने अपने पद व जिम्मेदारी के साथ अपराध किया है। तुमने १२० करोड़ इस जनता के साथ मजाक किया है- इसलिये तुम ईमानदार नहीं हो...क्योंकि तुम बेइमानों के सरदार हो।गठबंधन के कुछ लोग अपनी तिजोरियों काला बाजारी को प्रोत्साहन देकर- कभी इम्पोर्ट- कभी एक्सपोर्ट करके महंगाई के कोड़े से जनता को पीट-पीटकर मार रहे हैं- सब कुछ देखकर-जानकर भी तुम चुप हो- क्योंकि तुम कुर्सी के लिये गठबंधन का धर्म तो निभा रहे हो-पर गणतन्त्र को भूले जा रहे हो।अतीत में प्याज में बढ़ी कीमतों ने राजग सरकार की छुट्टी की थी..तुम्हारे यहां तो महंगाई व घोटालों ने रिकार्ड ही तोड़ दिया है।अब जनता भी तुमको अपना निर्णय सुनायेगी।ऐसी सरकार जनता फिर नहीं लायेगी...अर्थात जनता तुमको व तुम्हारे साथियों को लम्बी छुट्टी पर भेजने का मन बना रही है। तुमलोगों को लाइन हाजिर करने का निर्णय जनता की अदालत से आ सकता है।

Sanam's Hot Cake: फिर आ रहा हू

Sanam's Hot Cake: फिर आ रहा हू

फिर आ रहा हू

ब्लॉग पर इतने दिन मेरा न आना यह न समझना कि मै आपको भूल गया था , हकीकत कुछ ऐसी थी मै आप तक पहुचने के लिए अपना पासवर्ड ही भूल गया था आज बड़ी देर तक मसकत करने के बाद आप तक पहुचने के लिए मुझे राह मिल गयी हे अब में आप के पास नियमित रूप से आनेकी कोशीस करूँगा
संजय सनम